श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.22.21

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 22 · अथ द्वाविंशोऽध्यायः

शास्त्रेष्वियानेव सुनिश्चितो नृणां

क्षेमस्य सध्र्यग्विमृशेषु हेतुः।

असंग आत्मव्यतिरिक्त आत्मनि

दृढा र१तिर्ब्रह्मणि निर्गुणे च या॥ २१

śāstreṣviyāneva suniścito nṛṇāṃ

kṣemasya sadhryagvimṛśeṣu hetuḥ|

asaṃga ātmavyatirikta ātmani

dṛḍhā ratirbrahmaṇi nirguṇe ca yā|| 21

अर्थ

शास्त्र जीवोंके कल्याणके लिये भलीभाँति विचार करनेवाले हैं; उनमें आत्मासे भिन्‍न देहादिके प्रति वैराग्य तथा अपने आत्मस्वरूप निर्गुण ब्रह्ममें सुदृढ़ अनुराग होना—यही कल्याणका साधन निश्चित किया गया है॥ २१॥✎ 410

टिप्पणियाँ

  1. १

    प्रा० पा०—मति।

     

    (मुद्रित पृष्ठ 514)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #410 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीभगवान् की → श्रीभगवान्‌की

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