श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.22.27

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 22 · अथ द्वाविंशोऽध्यायः

दग्धाशयो मुक्तसमस्ततद‍्गुणो

नैवात्मनो बहिरन्तर्विचष्टे।

परात्मनोर्यद् व्यवधानं पुरस्तात्

स्‍वप्ने यथा पुरुषस्तद्विनाशे॥ २७

dagdhāśayo muktasamastatadguṇo

naivātmano bahirantarvicaṣṭe|

parātmanoryad vyavadhānaṃ purastāt

svapne yathā puruṣastadvināśe|| 27

अर्थ

इस प्रकार लिंग देहका नाश हो जानेपर वह उसके कर्तृत्वादि सभी गुणोंसे मुक्त हो जाता है। फिर तो जैसे स्वप्नावस्थामें तरह-तरहके पदार्थ देखनेपर भी उससे जग पड़नेपर उनमेंसे कोई चीज दिखायी नहीं देती, उसी प्रकार वह पुरुष शरीरके बाहर दिखायी देनेवाले घट-पटादि और भीतर अनुभव होनेवाले सुख-दुःखादिको भी नहीं देखता। इस स्थितिके प्राप्त होनेसे पहले ये पदार्थ ही जीवात्मा और परमात्माके बीचमें रहकर उनका भेद कर रहे थे॥ २७॥

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