श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.22.32

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 22 · अथ द्वाविंशोऽध्यायः

नातः परतरो लोके पुंसः स्वार्थव्यतिक्रमः।

यदध्यन्यस्य प्रेयस्त्वमात्मनः स्वव्यतिक्रमात्॥ ३२

nātaḥ parataro loke puṃsaḥ svārthavyatikramaḥ|

yadadhyanyasya preyastvamātmanaḥ svavyatikramāt|| 32

अर्थ

जिसके उद्देश्यसे अन्य सब पदार्थोमें प्रियताका बोध होता है—उस आत्माका अपनेद्वारा ही नाश होनेसे जो स्वार्थहानि होती है, उससे बढ़कर लोकमें जीवकी और कोई हानि नहीं है॥ ३२॥

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