जिसके उद्देश्यसे अन्य सब पदार्थोमें प्रियताका बोध होता है—उस आत्माका अपनेद्वारा ही नाश होनेसे जो स्वार्थहानि होती है, उससे बढ़कर लोकमें जीवकी और कोई हानि नहीं है॥ ३२॥
नातः परतरो लोके पुंसः स्वार्थव्यतिक्रमः।
यदध्यन्यस्य प्रेयस्त्वमात्मनः स्वव्यतिक्रमात्॥ ३२
जिसके उद्देश्यसे अन्य सब पदार्थोमें प्रियताका बोध होता है—उस आत्माका अपनेद्वारा ही नाश होनेसे जो स्वार्थहानि होती है, उससे बढ़कर लोकमें जीवकी और कोई हानि नहीं है॥ ३२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.22.32 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 515) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/22/32/