श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.22.40

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 22 · अथ द्वाविंशोऽध्यायः

कृच्छ्रो महानिह भवार्णवमप्लवेशां

षड्वर्गनक्रमसुखेन तितीरषन्ति।

तत् त्वं हरेर्भगवतो भजनीयमङ्‌घ्रिं

कृत्वोडुपं व्यसनमुत्तर दुस्तरार्णम्॥ ४०

kṛcchro mahāniha bhavārṇavamaplaveśāṃ

ṣaḍvarganakramasukhena titīraṣanti|

tat tvaṃ harerbhagavato bhajanīyamaṅghriṃ

kṛtvoḍupaṃ vyasanamuttara dustarārṇam|| 40

अर्थ

जो लोग मन और इन्द्रियरूप मगरोंसे भरे हुए इस संसारसागरको योगादि दुष्कर साधनोंसे पार करना चाहते हैं, उनका उस पार पहुँचना कठिन ही है; क्योंकि उन्हें कर्णधाररूप श्रीहरिका आश्रय नहीं है। अतः तुम तो भगवान्‌के आराधनीय चरणकमलोंको नौका बनाकर अनायास ही इस दुस्तर समुद्रको पार कर लो॥ ४०॥

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