॥ श्रीहरिः ॥
फलं ब्रह्मणि विन्यस्य निर्विषङ्गः समाहितः।
कर्माध्यक्षं च मन्वान आत्मानं प्रकृतेः परम्॥ ५१
phalaṃ brahmaṇi vinyasya nirviṣaṅgaḥ samāhitaḥ|
karmādhyakṣaṃ ca manvāna ātmānaṃ prakṛteḥ param|| 51
अर्थ
इस प्रकार एकाग्र चित्तसे समस्त कर्मोंका फल परमात्माको अर्पण करके आत्माको कर्मोंका साक्षी एवं प्रकृतिसे अतीत देखनेके कारण वे सर्वथा निर्लिप्त रहे॥ ५१॥
फलं ब्रह्मणि विन्यस्य निर्विषङ्गः समाहितः।
कर्माध्यक्षं च मन्वान आत्मानं प्रकृतेः परम्॥ ५१
इस प्रकार एकाग्र चित्तसे समस्त कर्मोंका फल परमात्माको अर्पण करके आत्माको कर्मोंका साक्षी एवं प्रकृतिसे अतीत देखनेके कारण वे सर्वथा निर्लिप्त रहे॥ ५१॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.22.51 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 518) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/22/51/