श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.22.57

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 22 · अथ द्वाविंशोऽध्यायः

दुर्धर्षस्तेजसेवाग्‍निर्महेन्द्र इव दुर्जयः।

तितिक्षया धरित्रीव द्यौरिवाभीष्टदो नृणाम्॥ ५७

durdharṣastejasevāgnirmahendra iva durjayaḥ|

titikṣayā dharitrīva dyaurivābhīṣṭado nṛṇām|| 57

अर्थ

वे तेजमें अग्‍निके समान दुर्धर्ष, इन्द्रके समान अजेय, पृथ्वीके समान क्षमाशील और स्वर्गके समान मनुष्योंकी समस्त कामनाएँ पूर्ण करनेवाले थे॥ ५७॥

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