॥ श्रीहरिः ॥
दुर्धर्षस्तेजसेवाग्निर्महेन्द्र इव दुर्जयः।
तितिक्षया धरित्रीव द्यौरिवाभीष्टदो नृणाम्॥ ५७
durdharṣastejasevāgnirmahendra iva durjayaḥ|
titikṣayā dharitrīva dyaurivābhīṣṭado nṛṇām|| 57
अर्थ
वे तेजमें अग्निके समान दुर्धर्ष, इन्द्रके समान अजेय, पृथ्वीके समान क्षमाशील और स्वर्गके समान मनुष्योंकी समस्त कामनाएँ पूर्ण करनेवाले थे॥ ५७॥
दुर्धर्षस्तेजसेवाग्निर्महेन्द्र इव दुर्जयः।
तितिक्षया धरित्रीव द्यौरिवाभीष्टदो नृणाम्॥ ५७
वे तेजमें अग्निके समान दुर्धर्ष, इन्द्रके समान अजेय, पृथ्वीके समान क्षमाशील और स्वर्गके समान मनुष्योंकी समस्त कामनाएँ पूर्ण करनेवाले थे॥ ५७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.22.57 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 518) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/22/57/