श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.22.6

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 22 · अथ द्वाविंशोऽध्यायः

हाटकासन आसीनान् स्वधिष्ण्येष्विव पावकान्।

श्रद्धासंयमसंयुक्तः प्रीतः प्राह भवाग्रजान्॥ ६

hāṭakāsana āsīnān svadhiṣṇyeṣviva pāvakān|

śraddhāsaṃyamasaṃyuktaḥ prītaḥ prāha bhavāgrajān|| 6

अर्थ

सनकादि मुनीश्‍वर भगवान् शंकरके भी अग्रज हैं। सोनेके सिंहासनपर वे ऐसे सुशोभित हुए, जैसे अपने-अपने स्थानोंपर अग्‍नि देवता। महाराज पृथुने बड़ी श्रद्धा और संयमके साथ प्रेमपूर्वक उनसे कहा॥ ६॥

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