सनकादि मुनीश्वर भगवान् शंकरके भी अग्रज हैं। सोनेके सिंहासनपर वे ऐसे सुशोभित हुए, जैसे अपने-अपने स्थानोंपर अग्नि देवता। महाराज पृथुने बड़ी श्रद्धा और संयमके साथ प्रेमपूर्वक उनसे कहा॥ ६॥
हाटकासन आसीनान् स्वधिष्ण्येष्विव पावकान्।
श्रद्धासंयमसंयुक्तः प्रीतः प्राह भवाग्रजान्॥ ६
सनकादि मुनीश्वर भगवान् शंकरके भी अग्रज हैं। सोनेके सिंहासनपर वे ऐसे सुशोभित हुए, जैसे अपने-अपने स्थानोंपर अग्नि देवता। महाराज पृथुने बड़ी श्रद्धा और संयमके साथ प्रेमपूर्वक उनसे कहा॥ ६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.22.6 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 512) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/22/6/