श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.23.18

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 23 · अथ त्रयोविंशोऽध्यायः

तं सर्वगुणविन्यासं जीवे मायामये न्यधात्।

तं चानुशयमात्मस्थमसावनुशयी पुमान्।

ज्ञानवैराग्यवीर्येण स्वरूपस्थोऽज२हात्प्रभुः॥ १८

taṃ sarvaguṇavinyāsaṃ jīve māyāmaye nyadhāt|

taṃ cānuśayamātmasthamasāvanuśayī pumān|

jñānavairāgyavīryeṇa svarūpastho'jahātprabhuḥ|| 18

अर्थ

फिर सम्पूर्ण गुणोंकी अभिव्यक्ति करनेवाले उस महत्तत्त्वको मायोपाधिक जीवमें स्थित किया। तदनन्तर उस मायारूप जीवकी उपाधिको भी उन्होंने ज्ञान और वैराग्यके प्रभावसे अपने शुद्ध ब्रह्मस्वरूपमें स्थित होकर त्याग दिया॥ १८॥

टिप्पणियाँ

  1. २

    प्रा० पा०—स्थो व्यधात्।

    (मुद्रित पृष्ठ 521)

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें