श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.23.26

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 23 · अथ त्रयोविंशोऽध्यायः

सैषा नूनं व्रजत्यूर्ध्वमनु वैन्यं पतिं सती।

पश्यतास्मानतीत्यार्चिर्दुर्विभाव्येन कर्मणा॥ २६

saiṣā nūnaṃ vrajatyūrdhvamanu vainyaṃ patiṃ satī|

paśyatāsmānatītyārcirdurvibhāvyena karmaṇā|| 26

अर्थ

अवश्य ही अपने अचिन्त्य कर्मके प्रभावसे यह सती हमें भी लाँघकर अपने पतिके साथ उच्चतर लोकोंको जा रही है॥ २६॥

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