श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.23.36

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 23 · अथ त्रयोविंशोऽध्यायः

विजयाभिमुखो राजा श्रुत्वैतदभियाति यान्।

बलिं तस्मै हरन्त्यग्रे राजानः पृथवे यथा॥ ३६

vijayābhimukho rājā śrutvaitadabhiyāti yān|

baliṃ tasmai harantyagre rājānaḥ pṛthave yathā|| 36

अर्थ

जो राजा विजयके लिये प्रस्थान करते समय इसे सुनकर जाता है, उसके आगे आ-आकर राजालोग उसी प्रकार भेंटें रखते हैं जैसे पृथुके सामने रखते थे॥ ३६॥✎ 411

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #411 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् में → भगवान्‌में

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