उन्होंने एक स्थानके बाद दूसरे स्थानमें लगातार इतने यज्ञ किये कि यह सारी भूमि पूर्वकी ओर अग्रभाग करके फैलाये हुए कुशोंसे पट गयी थी (इसीसे आगे चलकर वे ‘प्राचीनबर्हि’ नामसे विख्यात हुए)॥ १०॥
यस्येदं देवयजनमनु यज्ञं वितन्वतः।
प्राचीनाग्रैः कुशैरासीदास्तृतं वसुधातलम्॥ १०
उन्होंने एक स्थानके बाद दूसरे स्थानमें लगातार इतने यज्ञ किये कि यह सारी भूमि पूर्वकी ओर अग्रभाग करके फैलाये हुए कुशोंसे पट गयी थी (इसीसे आगे चलकर वे ‘प्राचीनबर्हि’ नामसे विख्यात हुए)॥ १०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.24.10 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 525) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/24/10/