विदुरजीने पूछा—ब्रह्मन्! मार्गमें प्रचेताओंका श्रीमहादेवजीके साथ किस प्रकार समागम हुआ और उनपर प्रसन्न होकर भगवान् शंकरने उन्हें क्या उपदेश किया, वह सारयुक्त बात आप कृपा करके मुझसे कहिये॥ १६॥
प्रचेतसां गिरित्रेण यथाऽऽसीत्पथि संगमः।
यदुताह हरः प्रीतस्तन्नो ब्रह्मन् वदार्थवत्॥ १६
विदुरजीने पूछा—ब्रह्मन्! मार्गमें प्रचेताओंका श्रीमहादेवजीके साथ किस प्रकार समागम हुआ और उनपर प्रसन्न होकर भगवान् शंकरने उन्हें क्या उपदेश किया, वह सारयुक्त बात आप कृपा करके मुझसे कहिये॥ १६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.24.16 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 525) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/24/16/