श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.24.18

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 24 · अथ चतुर्विंशोऽध्यायः

आत्मारामोऽपि यस्त्वस्य लोककल्पस्य राधसे।

शक्‍त्या युक्तो विचरति घोरया भगवान् भवः॥ १८

ātmārāmo'pi yastvasya lokakalpasya rādhase|

śaktyā yukto vicarati ghorayā bhagavān bhavaḥ|| 18

अर्थ

यद्यपि भगवान् शंकर आत्माराम हैं, उन्हें अपने लिये न कुछ करना है, न पाना, तो भी इस लोकसृष्टिकी रक्षाके लिये वे अपनी घोररूपा शक्ति (शिवा)-के साथ सर्वत्र विचरते रहते हैं॥ १८॥

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