चलते-चलते उन्होंने समुद्रके समान विशाल एक सरोवर देखा। वह महापुरुषोंके चित्तके समान बड़ा ही स्वच्छ था तथा उसमें रहनेवाले मत्स्यादि जलजीव भी प्रसन्न जान पड़ते थे॥ २०॥
समुद्रमुप विस्तीर्णमपश्यन् सुमहत्सरः।
महन्मन इव स्वच्छं प्रसन्नसलिलाशयम्॥ २०
चलते-चलते उन्होंने समुद्रके समान विशाल एक सरोवर देखा। वह महापुरुषोंके चित्तके समान बड़ा ही स्वच्छ था तथा उसमें रहनेवाले मत्स्यादि जलजीव भी प्रसन्न जान पड़ते थे॥ २०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.24.20 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 526) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/24/20/