उसके चारों ओर तरह-तरहके वृक्ष और लताएँ थीं, उनपर मतवाले भौंरे गूँज रहे थे। उनकी मधुर ध्वनिसे हर्षित होकर मानो उन्हें रोमांच हो रहा था। कमलकोशके परागपुंज वायुके झकोरोंसे चारों ओर उड़ रहे थे मानो वहाँ कोई उत्सव हो रहा है॥ २२॥
मत्तभ्रमरसौस्वर्यहृष्टरोमलताङ्घ्रिपम् ।
पद्मकोशरजो दिक्षु विक्षिपत्पवनोत्सवम्॥ २२
उसके चारों ओर तरह-तरहके वृक्ष और लताएँ थीं, उनपर मतवाले भौंरे गूँज रहे थे। उनकी मधुर ध्वनिसे हर्षित होकर मानो उन्हें रोमांच हो रहा था। कमलकोशके परागपुंज वायुके झकोरोंसे चारों ओर उड़ रहे थे मानो वहाँ कोई उत्सव हो रहा है॥ २२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.24.22 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 526) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/24/22/