श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.24.49

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 24 · अथ चतुर्विंशोऽध्यायः

सिंहस्कन्धत्विषो बिभ्रत्सौभगग्रीवकौस्तुभम्।

श्रियानपायिन्या क्षिप्तनिकषाश्मोरसोल्लसत् ॥ ४९

siṃhaskandhatviṣo bibhratsaubhagagrīvakaustubham|

śriyānapāyinyā kṣiptanikaṣāśmorasollasat || 49

अर्थ

उसके सिंहके समान स्थूल कंधे हैं—जिनपर हार, केयूर एवं कुण्डलादिकी कान्ति झिलमिलाती रहती है—तथा कौस्तुभमणिकी कान्तिसे सुशोभित मनोहर ग्रीवा है। उसका श्यामल वक्षःस्थल श्रीवत्स-चिह्नके रूपमें लक्ष्मीजीका नित्य निवास होनेके कारण कसौटीकी शोभाको भी मात करता है॥ ४९॥

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