प्रभो! चित्तशुद्धिकी अभिलाषा रखनेवाले पुरुषको आपके इस रूपका निरन्तर ध्यान करना चाहिये; इसकी भक्ति ही स्वधर्मका पालन करनेवाले पुरुषको अभय करनेवाली है॥ ५३॥✎ 414
एतद्रूपमनुध्येयमात्मशुद्धिमभीप्सताम् ।
यद्भक्तियोगोऽभयदः स्वधर्ममनुतिष्ठताम्॥ ५३
प्रभो! चित्तशुद्धिकी अभिलाषा रखनेवाले पुरुषको आपके इस रूपका निरन्तर ध्यान करना चाहिये; इसकी भक्ति ही स्वधर्मका पालन करनेवाले पुरुषको अभय करनेवाली है॥ ५३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.24.53 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 530) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/24/53/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)