श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.24.63

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 24 · अथ चतुर्विंशोऽध्यायः

त्वमेक आद्यः पुरुषः सुप्तशक्ति-

स्तया रजःसत्त्वतमो विभिद्यते।

महानहं खं मरुदग्‍निवार्धराः

सुरर्षयो भूतगणा इदं यतः॥ ६३

tvameka ādyaḥ puruṣaḥ suptaśakti-

stayā rajaḥsattvatamo vibhidyate|

mahānahaṃ khaṃ marudagnivārdharāḥ

surarṣayo bhūtagaṇā idaṃ yataḥ|| 63

अर्थ

प्रभो! आप ही अद्वितीय आदिपुरुष हैं। सृष्टिके पूर्व आपकी मायाशक्ति सोयी रहती है। फिर उसीके द्वारा सत्त्व, रज और तमरूप गुणोंका भेद होता है और इसके बाद उन्हीं गुणोंसे महत्तत्त्व, अहंकार, आकाश, वायु, अग्‍नि, जल, पृथ्वी, देवता, ऋषि और समस्त प्राणियोंसे युक्त इस जगत‍्की उत्पत्ति होती है॥ ६३॥

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