श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.25.41

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 25 · अथ पञ्चविंशोऽध्यायः

का नाम वीर विख्यातं वदान्यं प्रियदर्शनम्।

न वृणीत प्रियं२ प्राप्तं मादृशी त्वादृशं पतिम्३॥ ४१

kā nāma vīra vikhyātaṃ vadānyaṃ priyadarśanam|

na vṛṇīta priyaṃ prāptaṃ mādṛśī tvādṛśaṃ patim|| 41

अर्थ

वीरशिरोमणे! लोकमें मेरी-जैसी कौन स्त्री होगी, जो स्वयं प्राप्त हुए आप-जैसे सुप्रसिद्ध, उदारचित्त और सुन्दर पतिको वरण न करेगी॥ ४१॥✎ 1336 1337

टिप्पणियाँ

  1. २

    प्रा० पा०—पतिं।

    (मुद्रित पृष्ठ 537)
  2. ३

    प्रा० पा०—स्वयम्।

    (मुद्रित पृष्ठ 537)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #1336 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): गृह-स्थाश्रममें → गृहस्थाश्रममें
  • #1337 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: विषय-भोगों-की → विषय-भोगोंकी

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