श्रीनारदजी कहते हैं—राजन्! उन स्त्री-पुरुषोंने इस प्रकार एक-दूसरेकी बातका समर्थन कर फिर सौ वर्षोंतक उस पुरीमें रहकर आनन्द भोगा॥ ४३॥✎ 13381339
इति तौ दम्पती तत्र समुद्य समयं मिथः।
तां प्रविश्य पुरीं राजन्मुमुदाते शतं समाः॥ ४३
श्रीनारदजी कहते हैं—राजन्! उन स्त्री-पुरुषोंने इस प्रकार एक-दूसरेकी बातका समर्थन कर फिर सौ वर्षोंतक उस पुरीमें रहकर आनन्द भोगा॥ ४३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.25.43 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 538) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/25/43/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
#1338 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): निऋर्ति → निऋर्ऋति
#1339 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): निऋर्ऋति → निर्ऋति