श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.25.5

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 25 · अथ पञ्चविंशोऽध्यायः

राजोवाच

न जानामि महाभाग परं कर्मापविद्धधीः।

ब्रूहि मे विमलं ज्ञानं येन मुच्येय कर्मभिः॥ ५

na jānāmi mahābhāga paraṃ karmāpaviddhadhīḥ|

brūhi me vimalaṃ jñānaṃ yena mucyeya karmabhiḥ|| 5

अर्थ

राजाने कहा—महाभाग नारदजी! मेरी बुद्धि कर्ममें फँसी हुई है, इसलिये मुझे परम कल्याणका कोई पता नहीं है। आप मुझे विशुद्ध ज्ञानका उपदेश दीजिये, जिससे मैं इस कर्मबन्धनसे छूट जाऊँ॥ ५॥

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