तथा निर्ऋति नामका जो दूसरा पश्चिम द्वार था, उससे लुब्धकके साथ वह वैशस नामके देशको जाता था॥ ५३॥✎ 13381339
निर्ऋतिर्नाम पश्चाद् द्वास्तया याति पुरंजनः।
वैशसं नाम विषयं लुब्धकेन समन्वितः॥ ५३
तथा निर्ऋति नामका जो दूसरा पश्चिम द्वार था, उससे लुब्धकके साथ वह वैशस नामके देशको जाता था॥ ५३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.25.53 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 538) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/25/53/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (4)
#1033 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): निऋर्तिर्नाम → निऋर्ऋतिर्नाम
#1034 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): निऋर्ऋतिर्नाम → निर्ऋतिर्नाम
#1338 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): निऋर्ति → निऋर्ऋति
#1339 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): निऋर्ऋति → निर्ऋति