॥ श्रीहरिः ॥
क्व वर्तते सा ललना मज्जन्तं व्यसनार्णवे।
या मामुद्धरते प्रज्ञां दीपयन्ती पदे पदे॥ १६
kva vartate sā lalanā majjantaṃ vyasanārṇave|
yā māmuddharate prajñāṃ dīpayantī pade pade|| 16
अर्थ
अतः बताओ, वह सुन्दरी कहाँ है, जो दुःख-समुद्रमें डूबनेपर मेरी विवेक-बुद्धिको पद-पदपर जाग्रत् करके मुझे उस संकटसे उबार लेती है?’॥ १६॥
क्व वर्तते सा ललना मज्जन्तं व्यसनार्णवे।
या मामुद्धरते प्रज्ञां दीपयन्ती पदे पदे॥ १६
अतः बताओ, वह सुन्दरी कहाँ है, जो दुःख-समुद्रमें डूबनेपर मेरी विवेक-बुद्धिको पद-पदपर जाग्रत् करके मुझे उस संकटसे उबार लेती है?’॥ १६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.26.16 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 541) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/26/16/