श्रीनारदजी कहते हैं—राजन्! उस स्त्रीके संगसे राजा पुरंजनका विवेक नष्ट हो चुका था; इसलिये अपनी रानीको पृथ्वीपर अस्त-व्यस्त अवस्थामें पड़ी देखकर वह अत्यन्त व्याकुल हो गया॥ १८॥
पुरंजनः स्वमहिषीं निरीक्ष्यावधुतां भुवि।
तत्संगोन्मथितज्ञानो वैक्लव्यं परमं ययौ॥ १८
श्रीनारदजी कहते हैं—राजन्! उस स्त्रीके संगसे राजा पुरंजनका विवेक नष्ट हो चुका था; इसलिये अपनी रानीको पृथ्वीपर अस्त-व्यस्त अवस्थामें पड़ी देखकर वह अत्यन्त व्याकुल हो गया॥ १८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.26.18 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 541) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/26/18/