कालकन्याकी बात सुनकर यवनराजने विधाताका एक गुप्त कार्य करानेकी इच्छासे मुसकराते हुए उससे कहा॥ २७॥
कालकन्योदितवचो निशम्य यवनेश्वरः।
चिकीर्षुर्देवगुह्यं स सस्मितं तामभाषत॥ २७
कालकन्याकी बात सुनकर यवनराजने विधाताका एक गुप्त कार्य करानेकी इच्छासे मुसकराते हुए उससे कहा॥ २७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.27.27 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 545) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/27/27/