श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.27.27

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 27 · अथ सप्तविंशोऽध्यायः

कालकन्योदितवचो निशम्य यवनेश्‍वरः।

चिकीर्षुर्देवगुह्यं स सस्मितं तामभाषत॥ २७

kālakanyoditavaco niśamya yavaneśvaraḥ|

cikīrṣurdevaguhyaṃ sa sasmitaṃ tāmabhāṣata|| 27

अर्थ

कालकन्याकी बात सुनकर यवनराजने विधाताका एक गुप्त कार्य करानेकी इच्छासे मुसकराते हुए उससे कहा॥ २७॥

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