‘हाय! मेरी भार्या तो बहुत घर-गृहस्थीवाली है; जब मैं परलोकको चला जाऊँगा, तब यह असहाय होकर किस प्रकार अपना निर्वाह करेगी? इसे इन बाल-बच्चोंकी चिन्ता ही खा जायगी॥ १८॥
लोकान्तरं गतवति मय्यनाथा कुटुम्बिनी।
वर्तिष्यते कथं त्वेषा बालकाननुशोचती॥ १८
‘हाय! मेरी भार्या तो बहुत घर-गृहस्थीवाली है; जब मैं परलोकको चला जाऊँगा, तब यह असहाय होकर किस प्रकार अपना निर्वाह करेगी? इसे इन बाल-बच्चोंकी चिन्ता ही खा जायगी॥ १८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.28.18 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 547) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/28/18/