मुझसे कोई भूल हो जाती तो यह मुझे सचेत कर देती थी। मुझमें इसका इतना अधिक स्नेह है कि यदि मैं कभी परदेश चला जाता था तो यह विरहव्यथासे सूखकर काँटा हो जाती थी। यों तो यह वीरमाता है, तो भी मेरे पीछे क्या यह गृहस्थाश्रमका व्यवहार चला सकेगी?॥ २०॥
प्रबोधयति माविज्ञं व्युषिते शोककर्शिता।
वर्त्मैतद् गृहमेधीयं वीरसूरपि नेष्यति॥ २०
मुझसे कोई भूल हो जाती तो यह मुझे सचेत कर देती थी। मुझमें इसका इतना अधिक स्नेह है कि यदि मैं कभी परदेश चला जाता था तो यह विरहव्यथासे सूखकर काँटा हो जाती थी। यों तो यह वीरमाता है, तो भी मेरे पीछे क्या यह गृहस्थाश्रमका व्यवहार चला सकेगी?॥ २०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.28.20 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 548) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/28/20/