जब यवनलोग उसे पशुके समान बाँधकर अपने स्थानको ले चले, तब उसके अनुचरगण अत्यन्त आतुर और शोकाकुल होकर उसके साथ हो लिये॥ २३॥
पशुवद्यवनैरेष नीयमानः स्वकं क्षयम्।
अन्वद्रवन्ननुपथाः शोचन्तो भृशमातुराः॥ २३
जब यवनलोग उसे पशुके समान बाँधकर अपने स्थानको ले चले, तब उसके अनुचरगण अत्यन्त आतुर और शोकाकुल होकर उसके साथ हो लिये॥ २३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.28.23 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 548) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/28/23/