श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.28.45

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 28 · अथाष्टाविंशोऽध्यायः

अजानती प्रियतमं यदोपरतमंगना।

सुस्थिरासनमासाद्य यथापूर्वमुपाचरत्॥ ४५

ajānatī priyatamaṃ yadoparatamaṃganā|

susthirāsanamāsādya yathāpūrvamupācarat|| 45

अर्थ

उसके पति परलोकवासी हो चुके थे, परन्तु पूर्ववत् स्थिर आसनसे विराजमान थे। इस रहस्यको न जाननेके कारण वह उनके पास जाकर उनकी पूर्ववत् सेवा करने लगी॥ ४५॥

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