॥ श्रीहरिः ॥
चितिं१ दारुमयीं चित्वा तस्यां पत्युः कलेवरम्।
आदीप्य चानुमरणे विलपन्ती मनो दधे॥ ५०
citiṃ dārumayīṃ citvā tasyāṃ patyuḥ kalevaram|
ādīpya cānumaraṇe vilapantī mano dadhe|| 50
अर्थ
लकड़ियोंकी चिता बनाकर उसने उसपर पतिका शव रखा और अग्नि लगाकर विलाप करते-करते स्वयं सती होनेका निश्चय किया॥ ५०॥
चितिं दारुमयीं चित्वा तस्यां पत्युः कलेवरम्।
आदीप्य चानुमरणे विलपन्ती मनो दधे॥ ५०
लकड़ियोंकी चिता बनाकर उसने उसपर पतिका शव रखा और अग्नि लगाकर विलाप करते-करते स्वयं सती होनेका निश्चय किया॥ ५०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.28.50 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 551) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/28/50/टिप्पणियाँ
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प्रा० पा०—चिता।
(मुद्रित पृष्ठ 551)