श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.28.50

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 28 · अथाष्टाविंशोऽध्यायः

चितिं१ दारुमयीं चित्वा तस्यां पत्युः कलेवरम्।

आदीप्य चानुमरणे विलपन्ती मनो दधे॥ ५०

citiṃ dārumayīṃ citvā tasyāṃ patyuḥ kalevaram|

ādīpya cānumaraṇe vilapantī mano dadhe|| 50

अर्थ

लकड़ियोंकी चिता बनाकर उसने उसपर पतिका शव रखा और अग्‍नि लगाकर विलाप करते-करते स्वयं सती होनेका निश्‍चय किया॥ ५०॥

टिप्पणियाँ

  1. १

    प्रा० पा०—चिता।

    (मुद्रित पृष्ठ 551)

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