श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.29.18

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 29 · अथैकोनत्रिंशोऽध्यायः

देहो रथस्त्विन्द्रियाश्‍वः संवत्सररयोऽगतिः।

द्विकर्मचक्रस्त्रिगुणध्वजः पंचासुबन्धुरः॥ १८

deho rathastvindriyāśvaḥ saṃvatsararayo'gatiḥ|

dvikarmacakrastriguṇadhvajaḥ paṃcāsubandhuraḥ|| 18

अर्थ

शरीर ही रथ है। उसमें ज्ञानेन्द्रियरूप पाँच घोड़े जुते हुए हैं। देखनेमें संवत्सररूप कालके समान ही उसका अप्रतिहत वेग है, वास्तवमें वह गतिहीन है। पुण्य और पाप—ये दो प्रकारके कर्म ही उसके पहिये हैं, तीन गुण ध्वजा हैं, पाँच प्राण डोरियाँ हैं॥ १८॥

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