श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.29.20

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 29 · अथैकोनत्रिंशोऽध्यायः

आकूतिर्विक्रमो बाह्यो मृगतृष्णां प्रधावति।

एकादशेन्द्रियचमूः पंचसूनाविनोदकृत्॥ २०

ākūtirvikramo bāhyo mṛgatṛṣṇāṃ pradhāvati|

ekādaśendriyacamūḥ paṃcasūnāvinodakṛt|| 20

अर्थ

पाँच कर्मेन्द्रियाँ उसकी पाँच प्रकारकी गति हैं। इस रथपर चढ़कर रथीरूप यह जीव मृगतृष्णाके समान मिथ्या विषयोंकी ओर दौड़ता है। ग्यारह इन्द्रियाँ उसकी सेना हैं तथा पाँच ज्ञानेन्द्रियोंके द्वारा उन-उन इन्द्रियोंके विषयोंको अन्यायपूर्वक ग्रहण करना ही उसका शिकार खेलना है॥ २०॥

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