पाँच कर्मेन्द्रियाँ उसकी पाँच प्रकारकी गति हैं। इस रथपर चढ़कर रथीरूप यह जीव मृगतृष्णाके समान मिथ्या विषयोंकी ओर दौड़ता है। ग्यारह इन्द्रियाँ उसकी सेना हैं तथा पाँच ज्ञानेन्द्रियोंके द्वारा उन-उन इन्द्रियोंके विषयोंको अन्यायपूर्वक ग्रहण करना ही उसका शिकार खेलना है॥ २०॥
आकूतिर्विक्रमो बाह्यो मृगतृष्णां प्रधावति।
एकादशेन्द्रियचमूः पंचसूनाविनोदकृत्॥ २०
पाँच कर्मेन्द्रियाँ उसकी पाँच प्रकारकी गति हैं। इस रथपर चढ़कर रथीरूप यह जीव मृगतृष्णाके समान मिथ्या विषयोंकी ओर दौड़ता है। ग्यारह इन्द्रियाँ उसकी सेना हैं तथा पाँच ज्ञानेन्द्रियोंके द्वारा उन-उन इन्द्रियोंके विषयोंको अन्यायपूर्वक ग्रहण करना ही उसका शिकार खेलना है॥ २०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.29.20 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 555) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/29/20/