वृद्धावस्था ही साक्षात् कालकन्या है, उसे कोई भी पुरुष पसंद नहीं करता। तब मृत्युरूप यवनराजने लोकका संहार करनेके लिये उसे बहिन मानकर स्वीकार कर लिया॥ २२॥
कालकन्या जरा साक्षाल्लोकस्तां नाभिनन्दति।
स्वसारं जगृहे मृत्युः क्षयाय यवनेश्वरः॥ २२
वृद्धावस्था ही साक्षात् कालकन्या है, उसे कोई भी पुरुष पसंद नहीं करता। तब मृत्युरूप यवनराजने लोकका संहार करनेके लिये उसे बहिन मानकर स्वीकार कर लिया॥ २२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.29.22 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 555) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/29/22/