श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.29.28

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 29 · अथैकोनत्रिंशोऽध्यायः

शुक्लात्प्रकाशभूयिष्ठाँल्लोकानाप्नोति२ कर्हिचित्।

दुःखोदर्कान् क्रियायासांस्तमः शोकोत्कटान् क्‍वचित्॥ २८

śuklātprakāśabhūyiṣṭhām̐llokānāpnoti karhicit|

duḥkhodarkān kriyāyāsāṃstamaḥ śokotkaṭān kvacit|| 28

अर्थ

वह कभी तो सात्त्विक कर्मोंके द्वारा प्रकाशबहुल स्वर्गादि लोक प्राप्त करता है, कभी राजसी कर्मोंके द्वारा दुःखमय रजोगुणी लोकोंमें जाता है—जहाँ उसे तरह-तरहके कर्मोंका क्लेश उठाना पड़ता है—और कभी तमोगुणी कर्मोंके द्वारा शोकबहुल तमोमयी योनियोंमें जन्म लेता है॥ २८॥✎ 1345 1346 1347

टिप्पणियाँ

  1. २

    प्रा० पा०—ल्लोकान् प्राप्नोति।

    (मुद्रित पृष्ठ 556)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (3)
  • #1345 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): स्व-रूपको → स्वरूपको
  • #1346 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): विषयों-का → विषयोंका
  • #1347 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): मनुष्य-शरीरमें → मनुष्यशरीरमें

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