बर्हिष्मन्! तुम इन कर्मोंमें परमार्थबुद्धि मत करो। ये सुननेमें ही प्रिय जान पड़ते हैं, परमार्थका तो स्पर्श भी नहीं करते। ये जो परमार्थवत् दीख पड़ते हैं, इसमें केवल अज्ञान ही कारण है॥ ४७॥✎ 4201608
तस्मात्कर्मसु बर्हिष्मन्नज्ञानादर्थकाशिषु।
मार्थदृष्टिं कृथाः श्रोत्रस्पर्शिष्वस्पृष्टवस्तुषु॥ ४७
बर्हिष्मन्! तुम इन कर्मोंमें परमार्थबुद्धि मत करो। ये सुननेमें ही प्रिय जान पड़ते हैं, परमार्थका तो स्पर्श भी नहीं करते। ये जो परमार्थवत् दीख पड़ते हैं, इसमें केवल अज्ञान ही कारण है॥ ४७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.29.47 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 558) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/29/47/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
#420 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् में → भगवान्में