श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.29.47

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 29 · अथैकोनत्रिंशोऽध्यायः

तस्मात्कर्मसु बर्हिष्मन्‍नज्ञानादर्थकाशिषु।

मार्थदृष्टिं कृथाः श्रोत्रस्पर्शिष्वस्पृष्टवस्तुषु॥ ४७

tasmātkarmasu barhiṣmannajñānādarthakāśiṣu|

mārthadṛṣṭiṃ kṛthāḥ śrotrasparśiṣvaspṛṣṭavastuṣu|| 47

अर्थ

बर्हिष्मन्! तुम इन कर्मोंमें परमार्थबुद्धि मत करो। ये सुननेमें ही प्रिय जान पड़ते हैं, परमार्थका तो स्पर्श भी नहीं करते। ये जो परमार्थवत् दीख पड़ते हैं, इसमें केवल अज्ञान ही कारण है॥ ४७॥✎ 420 1608

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #420 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् में → भगवान्‌में
  • #1608 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: (आत्मतत्त्व)-को → (आत्मतत्त्व)को

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