बुद्धि अथवा अविद्याको ही तुम पुरंजनी नामकी स्त्री जानो; इसीके कारण देह और इन्द्रिय आदिमें मैं-मेरेपनका भाव उत्पन्न होता है और पुरुष इसीका आश्रय लेकर शरीरमें इन्द्रियोंद्वारा विषयोंको भोगता है॥ ५॥✎ 1342
बुद्धिं तु प्रमदां विद्यान्ममाहमिति यत्कृतम्।
यामधिष्ठाय देहेऽस्मिन् पुमान् भुङ्क्तेऽक्षभिर्गुणान्॥ ५
बुद्धि अथवा अविद्याको ही तुम पुरंजनी नामकी स्त्री जानो; इसीके कारण देह और इन्द्रिय आदिमें मैं-मेरेपनका भाव उत्पन्न होता है और पुरुष इसीका आश्रय लेकर शरीरमें इन्द्रियोंद्वारा विषयोंको भोगता है॥ ५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.29.5 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 553) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/29/5/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#1342 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): वृत्तियों-वाला → वृत्तियोंवाला