श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.29.51

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 29 · अथैकोनत्रिंशोऽध्यायः

स वै प्रियतमश्चात्मा यतो न भयमण्वपि।

इति वेद स वै विद्वान् यो विद्वान् स गुरुर्हरिः॥ ५१

sa vai priyatamaścātmā yato na bhayamaṇvapi|

iti veda sa vai vidvān yo vidvān sa gururhariḥ|| 51

अर्थ

‘जिससे किसीको अणुमात्र भी भय नहीं होता, वही उसका प्रियतम आत्मा है’ ऐसा जो पुरुष जानता है, वही ज्ञानी है और जो ज्ञानी है, वही गुरु एवं साक्षात् श्रीहरि है॥ ५१॥

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