श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.29.53

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 29 · अथैकोनत्रिंशोऽध्यायः

क्षुद्रंचरं सुमनसां शरणे मिथित्वा

रक्तं षडङ्‌घ्रिगणसामसु लुब्धकर्णम्।

अग्रे वृकानसुतृपोऽविगणय्य यान्तं

पृष्ठे मृगं मृगय लुब्धकबाणभिन्‍नम्॥ ५३

kṣudraṃcaraṃ sumanasāṃ śaraṇe mithitvā

raktaṃ ṣaḍaṅghrigaṇasāmasu lubdhakarṇam|

agre vṛkānasutṛpo'vigaṇayya yāntaṃ

pṛṣṭhe mṛgaṃ mṛgaya lubdhakabāṇabhinnam|| 53

अर्थ

‘पुष्पवाटिकामें अपनी हरिनीके साथ विहार करता हुआ एक हरिन मस्त घूम रहा है, वह दूब आदि छोटे-छोटे अंकुरोंको चर रहा है। उसके कान भौंरोंके मधुर गुंजारमें लग रहे हैं। उसके सामने ही दूसरे जीवोंको मारकर अपना पेट पालनेवाले भेड़िये ताक लगाये खड़े हैं और पीछेसे शिकारी व्याधने बींधनेके लिये उसपर बाण छोड़ दिया है। परन्तु हरिन इतना बेसुध है कि उसे इसका कुछ भी पता नहीं है।’ एक बार इस हरिनकी दशापर विचार करो॥ ५३॥

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