श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.29.55

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 29 · अथैकोनत्रिंशोऽध्यायः

स त्वं विचक्ष्य मृगचेष्टितमात्मनोऽन्त-

श्‍चित्तं नियच्छ हृदि कर्णधुनीं च चित्ते।

जह्यंगनाश्रममसत्तमयूथगाथं

प्रीणीहि हंसशरणं विरम क्रमेण॥ ५५

sa tvaṃ vicakṣya mṛgaceṣṭitamātmano'nta-

ścittaṃ niyaccha hṛdi karṇadhunīṃ ca citte|

jahyaṃganāśramamasattamayūthagāthaṃ

prīṇīhi haṃsaśaraṇaṃ virama krameṇa|| 55

अर्थ

इस प्रकार अपनेको मृगकी-सी स्थितिमें देखकर तुम अपने चित्तको हृदयके भीतर निरुद्ध करो और नदीकी भाँति प्रवाहित होनेवाली श्रवणेन्द्रियकी बाह्य वृत्तिको चित्तमें स्थापित करो (अन्तर्मुखी करो)। जहाँ कामी पुरुषोंकी चर्चा होती रहती है, उस गृहस्थाश्रमको छोड़कर परमहंसोंके आश्रय श्रीहरिको प्रसन्‍न करो और क्रमशः सभी विषयोंसे विरत हो जाओ॥ ५५॥

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