॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 4.29.58
कर्माण्यारभते येन पुमानिह विहाय तम्।
अमुत्रान्येन देहेन जुष्टानि स यदश्नुते॥ ५८
karmāṇyārabhate yena pumāniha vihāya tam|
amutrānyena dehena juṣṭāni sa yadaśnute|| 58
अर्थ
वेदवादियोंका कथन जगह-जगह सुना जाता है कि ‘पुरुष इस लोकमें जिसके द्वारा कर्म करता है, उस स्थूलशरीरको यहीं छोड़कर परलोकमें कर्मोंसे ही बने हुए दूसरी देहसे उनका फल भोगता है। किन्तु यह बात कैसे हो सकती है?’ (क्योंकि उन कर्मोंका कर्ता स्थूलशरीर तो यहीं नष्ट हो जाता है।) इसके सिवा जो-जो कर्म यहाँ किये जाते हैं, वे तो दूसरे ही क्षणमें अदृश्य हो जाते हैं; वे परलोकमें फल देनेके लिये किस प्रकार पुनः प्रकट हो सकते हैं?॥ ५८-५९॥