bhaviṣyataśca bhadraṃ te tathaiva na bhaviṣyataḥ|| 66
अर्थ
राजन्! तुम्हारा कल्याण हो। मन ही मनुष्यके पूर्वरूपोंको तथा भावी शरीरादिको भी बता देता है और जिनका भावी जन्म होनेवाला नहीं होता, उन तत्त्व-वेत्ताओंकी विदेहमुक्तिका पता भी उनके मनसे ही लग जाता है॥ ६६॥✎ 421
मन एव मनुष्यस्य पूर्वरूपाणि शंसति।
भविष्यतश्च भद्रं ते तथैव न भविष्यतः॥ ६६
राजन्! तुम्हारा कल्याण हो। मन ही मनुष्यके पूर्वरूपोंको तथा भावी शरीरादिको भी बता देता है और जिनका भावी जन्म होनेवाला नहीं होता, उन तत्त्व-वेत्ताओंकी विदेहमुक्तिका पता भी उनके मनसे ही लग जाता है॥ ६६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.29.66 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 561) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/29/66/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)