श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.29.66

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 29 · अथैकोनत्रिंशोऽध्यायः

मन एव मनुष्यस्य पूर्वरूपाणि शंसति।

भविष्यतश्‍च भद्रं ते तथैव न भविष्यतः॥ ६६

mana eva manuṣyasya pūrvarūpāṇi śaṃsati|

bhaviṣyataśca bhadraṃ te tathaiva na bhaviṣyataḥ|| 66

अर्थ

राजन्! तुम्हारा कल्याण हो। मन ही मनुष्यके पूर्वरूपोंको तथा भावी शरीरादिको भी बता देता है और जिनका भावी जन्म होनेवाला नहीं होता, उन तत्त्व-वेत्ताओंकी विदेहमुक्तिका पता भी उनके मनसे ही लग जाता है॥ ६६॥✎ 421

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #421 शब्दोंके बीचका स्थान: देश,काल → देश, काल

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