श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.29.69

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 29 · अथैकोनत्रिंशोऽध्यायः

सत्त्वैकनिष्ठे मनसि भगवत्पार्श्ववर्तिनि।

तमश्‍चन्द्रमसीवेदमुपरज्यावभासते१ ॥ ६९

sattvaikaniṣṭhe manasi bhagavatpārśvavartini|

tamaścandramasīvedamuparajyāvabhāsate || 69

अर्थ

साधारणतया तो सब पदार्थोंका क्रमशः ही भान होता है; किन्तु यदि किसी समय भगवच्चिन्तनमें लगा हुआ मन विशुद्ध सत्त्वमें स्थित हो जाय, तो उसमें भगवान्‌का संसर्ग होनेसे एक साथ समस्त विश्‍वका भी भान हो सकता है—जैसे राहु दृष्टिका विषय न होनेपर भी प्रकाशात्मक चन्द्रमाके संसर्गसे दीखने लगता है॥ ६९॥

टिप्पणियाँ

  1. १

    प्रा० पा०—वेह उप०।

    (मुद्रित पृष्ठ 562)

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