॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 4.29.71
सुप्तिमूर्च्छोपतापेषु प्राणायनविघाततः।
नेहतेऽहमिति ज्ञानं मृत्युप्रज्वारयोरपि॥ ७१
suptimūrcchopatāpeṣu prāṇāyanavighātataḥ|
nehate'hamiti jñānaṃ mṛtyuprajvārayorapi|| 71
अर्थ
सुषुप्ति, मूर्च्छा, अत्यन्त दुःख तथा मृत्यु और तीव्र ज्वरादिके समय भी इन्द्रियोंकी व्याकुलताके कारण ‘मैं’ और ‘मेरेपन’ की स्पष्ट प्रतीति नहीं होती; किन्तु उस समय भी उनका अभिमान तो बना ही रहता है॥ ७१॥