sati karmaṇyavidyāyāṃ bandhaḥ karmaṇyanātmanaḥ|| 78
अर्थ
जीव जब इन्द्रियजनित भोगोंका चिन्तन करते हुए बार-बार उन्हींके लिये कर्म करता है, तब उन कर्मोंके होते रहनेसे अविद्यावश वह देहादिके कर्मोंमें बँध जाता है॥ ७८॥
यदाक्षैश्चरितान् ध्यायन् कर्माण्याचिनुतेऽसकृत्।
सति कर्मण्यविद्यायां बन्धः कर्मण्यनात्मनः॥ ७८
जीव जब इन्द्रियजनित भोगोंका चिन्तन करते हुए बार-बार उन्हींके लिये कर्म करता है, तब उन कर्मोंके होते रहनेसे अविद्यावश वह देहादिके कर्मोंमें बँध जाता है॥ ७८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.29.78 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 563) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/29/78/