श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.3.1

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 3 · अथ तृतीयोऽध्यायः

अथ तृतीयोऽध्यायः

सतीका पिताके यहाँ यज्ञोत्सवमें जानेके लिये आग्रह करना

मैत्रेय उवाच

सदा विद्विषतोरेवं कालो वै ध्रियमाणयोः।

जामातुः श्‍वशुरस्यापि सुमहानतिचक्रमे॥ १

sadā vidviṣatorevaṃ kālo vai dhriyamāṇayoḥ|

jāmātuḥ śvaśurasyāpi sumahānaticakrame|| 1

अर्थ

श्रीमैत्रेयजी कहते हैं—विदुरजी! इस प्रकार उन ससुर और दामादको आपसमें वैर-विरोध रखते हुए बहुत अधिक समय निकल गया॥ १॥

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