श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.3.14

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 3 · अथ तृतीयोऽध्यायः

तन्मे प्रसीदेदममर्त्य वाञ्छितं

कर्तुं भवान्कारुणिको बतार्हति।

त्वयाऽऽत्मनोऽर्धेऽहमदभ्रचक्षुषा

निरूपिता मानुगृहाण याचितः॥ १४

tanme prasīdedamamartya vāñchitaṃ

kartuṃ bhavānkāruṇiko batārhati|

tvayā''tmano'rdhe'hamadabhracakṣuṣā

nirūpitā mānugṛhāṇa yācitaḥ|| 14

अर्थ

अतः देव! आप मुझपर प्रसन्‍न हों; आपको मेरी यह इच्छा अवश्य पूर्ण करनी चाहिये; आप बड़े करुणामय हैं, तभी तो परम ज्ञानी होकर भी आपने मुझे अपने आधे अंगमें स्थान दिया है। अब मेरी इस याचनापर ध्यान देकर मुझे अनुगृहीत कीजिये॥ १४॥

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें