श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.3.16

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 3 · अथ तृतीयोऽध्यायः

श्रीभगवानुवाच

त्वयोदितं शोभनमेव शोभने

अनाहुता अप्यभियन्ति बन्धुषु।

ते यद्यनुत्पादितदोषदृष्टयो

बलीयसानात्म्यमदेन मन्युना॥ १६

tvayoditaṃ śobhanameva śobhane

anāhutā apyabhiyanti bandhuṣu|

te yadyanutpāditadoṣadṛṣṭayo

balīyasānātmyamadena manyunā|| 16

अर्थ

भगवान् शंकरने कहा—सुन्दरि! तुमने जो कहा कि अपने बन्धुजनके यहाँ बिना बुलाये भी जा सकते हैं, सो तो ठीक ही है; किंतु ऐसा तभी करना चाहिये, जब उनकी दृष्टि अतिशय प्रबल देहाभिमानसे उत्पन्‍न हुए मद और क्रोधके कारण द्वेष-दोषसे युक्त न हो गयी हो॥ १६॥

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