श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.3.7

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 3 · अथ तृतीयोऽध्यायः

दृष्ट्वा स्वनिलयाभ्याशे लोलाक्षीर्मृष्टकुण्डलाः।

पतिं भूतपतिं देवमौत्सुक्यादभ्यभाषत॥ ७

dṛṣṭvā svanilayābhyāśe lolākṣīrmṛṣṭakuṇḍalāḥ|

patiṃ bhūtapatiṃ devamautsukyādabhyabhāṣata|| 7

अर्थ

उन्होंने देखा कि हमारे निवासस्थान कैलासके पाससे होकर सब ओरसे चंचल नेत्रोंवाली गन्धर्व और यक्षोंकी स्त्रियाँ चमकीले कुण्डल और हार पहने खूब सज-धजकर अपने-अपने पतियोंके साथ विमानोंपर बैठी उस यज्ञोत्सवमें जा रही हैं। इससे उन्हें भी बड़ी उत्सुकता हुई और उन्होंने अपने पति भगवान् भूतनाथसे कहा॥ ६-७॥

यह अर्थ श्लोक 6–7 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

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