श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.30.21

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 30 · अथ त्रिंशोऽध्यायः

मैत्रेय उवाच

एवं ब्रुवाणं पुरुषार्थभाजनं

जनार्दनं प्रांजलयः प्रचेतसः।

तद्दर्शनध्वस्ततमोरजोमला

गिरागृणन् गद्गदया सुहृत्तमम्॥ २१

evaṃ bruvāṇaṃ puruṣārthabhājanaṃ

janārdanaṃ prāṃjalayaḥ pracetasaḥ|

taddarśanadhvastatamorajomalā

girāgṛṇan gadgadayā suhṛttamam|| 21

अर्थ

श्रीमैत्रेयजी कहते हैं—भगवान्‌के दर्शनोंसे प्रचेताओंका रजोगुण-तमोगुण मल नष्ट हो चुका था। जब उनसे सकल पुरुषार्थोंके आश्रय और सबके परम सुहृद‍् श्रीहरिने इस प्रकार कहा, तब वे हाथ जोड़कर गद्गद वाणीसे कहने लगे॥ २१॥

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें