श्रीमैत्रेयजी कहते हैं—भगवान्के दर्शनोंसे प्रचेताओंका रजोगुण-तमोगुण मल नष्ट हो चुका था। जब उनसे सकल पुरुषार्थोंके आश्रय और सबके परम सुहृद् श्रीहरिने इस प्रकार कहा, तब वे हाथ जोड़कर गद्गद वाणीसे कहने लगे॥ २१॥
एवं ब्रुवाणं पुरुषार्थभाजनं
जनार्दनं प्रांजलयः प्रचेतसः।
तद्दर्शनध्वस्ततमोरजोमला
गिरागृणन् गद्गदया सुहृत्तमम्॥ २१
श्रीमैत्रेयजी कहते हैं—भगवान्के दर्शनोंसे प्रचेताओंका रजोगुण-तमोगुण मल नष्ट हो चुका था। जब उनसे सकल पुरुषार्थोंके आश्रय और सबके परम सुहृद् श्रीहरिने इस प्रकार कहा, तब वे हाथ जोड़कर गद्गद वाणीसे कहने लगे॥ २१॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.30.21 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 566) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/30/21/