॥ श्रीहरिः ॥
प्रचेतसोऽन्तरुदधौ पितुरादेशकारिणः।
जपयज्ञेन तपसा पुरंजनमतोषयन्॥ ३
pracetaso'ntarudadhau piturādeśakāriṇaḥ|
japayajñena tapasā puraṃjanamatoṣayan|| 3
अर्थ
श्रीमैत्रेयजीने कहा—विदुरजी! पिताके आज्ञाकारी प्रचेताओंने समुद्रके अंदर खड़े रहकर रुद्रगीतके जपरूपी यज्ञ और तपस्याके द्वारा समस्त शरीरोंके उत्पादक भगवान् श्रीहरिको प्रसन्न कर लिया॥ ३॥
प्रचेतसोऽन्तरुदधौ पितुरादेशकारिणः।
जपयज्ञेन तपसा पुरंजनमतोषयन्॥ ३
श्रीमैत्रेयजीने कहा—विदुरजी! पिताके आज्ञाकारी प्रचेताओंने समुद्रके अंदर खड़े रहकर रुद्रगीतके जपरूपी यज्ञ और तपस्याके द्वारा समस्त शरीरोंके उत्पादक भगवान् श्रीहरिको प्रसन्न कर लिया॥ ३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.30.3 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 564) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/30/3/